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सत्ता का आधार ,अधिकारी तंत्र की फाइलें या जनता का विश्वास

मुख्यमंत्री के लिए चिंतन का समय

रायपुर। विशेष राजनीतिक विश्लेषण
लोकतंत्र का यह शाश्वत सत्य है कि कोई भी सरकार प्रशासनिक अधिकारियों की फाइलों या उनकी ‘वोट’ से नहीं, बल्कि प्रदेश की उस बहुसंख्यक जनता के भरोसे से चुनी जाती है जो कतार में खड़े होकर मतदान करती है। आज छत्तीसगढ़ एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ मुख्यमंत्री को यह तय करना होगा कि सरकार की नीतियां केवल ‘बजट बचाने’ वाले अधिकारियों के हिसाब से चलेंगी या ‘जन-आकांक्षाओं’ के अनुरूप। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की ‘गारंटी’ ने सरकार को आधार तो दिया है, लेकिन उस आधार को आगे बढ़ाना पूरी तरह से मुख्यमंत्री की अपनी नीतिगत पकड़ और ‘पॉलिसी रिफॉर्म’ पर निर्भर करता है।
1. प्रशासनिक ‘अवरोध’ और सरकार की साख
अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी ऐसी जटिल नीतियां (Formats) सेट करते हैं जिससे प्रशासनिक काम तो आसान हो जाता है, लेकिन आम जनता और कर्मचारी वर्ग में आक्रोश पनपता है।
अतिथि व्याख्याता और अनियमित कर्मचारी: महाविद्यालयों के अतिथि व्याख्याताओं को बजट होने के बावजूद सही वेतन न मिलना और अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण की फाइलें सचिवालय के चक्कर काटना, सरकार के प्रति असंतोष का बड़ा कारण बन रहा है।
बजट का प्रबंधन: यदि बजट वित्त मंत्री के लिए आंकड़ों का खेल है, तो मुख्यमंत्री के लिए यह पूरे प्रदेश के विकास का साधन होना चाहिए।
2. बहुसंख्यक कर्मचारियों की ‘रुचि’ ही सफलता की कुंजी
प्रदेश के विभागों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी ही सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतारते हैं।
नियमितीकरण का यक्ष प्रश्न: संविदा और अनियमित कर्मचारियों का मानवी झेल (Human Suffering) झेलना सरकार की छवि को नुकसान पहुँचा रहा है।
प्रशासनिक सुधार: कमिश्नरी प्रणाली और तहसील स्तर पर सुधारों की फाइलें यदि अधिकारियों की सुविधानुसार अटकी रहेंगी, तो जनता का मोहभंग होना तय है।
3. मुख्यमंत्री के लिए ‘हनुमान’ कौन?
जैसे हनुमान जी ने अपनी शक्ति से राम काज संवारा था, वैसे ही मुख्यमंत्री को ऐसे ‘पॉलिसी मेकर्स’ की जरूरत है जो जनता के दुख को समझें, न कि ऐसे अधिकारियों की जो केवल ‘बजट सरेंडर’ करके वाहवाही लूटें। धान खरीदी से लेकर बिजली बिल की समस्याओं तक, हर जगह मुख्यमंत्री को खुद ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की पकड़ बनानी होगी।
4. आक्रोश से समाधान की ओर: एक सकारात्मक पहल
मुख्यमंत्री जी यदि वर्तमान चुनौतियों को पकड़ लेते हैं, तो उनके पास इतिहास रचने का अवसर है:
वेतन विसंगति दूर करना: अतिथि व्याख्याताओं को सम्मानजनक और पूर्ण वेतन देकर शिक्षा के स्तर को सुधारना।
संवेदनशीलता: “मोदी की गारंटी” को केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक आदेश में बदलना।
युवाओं को साथ लेना: शिक्षित युवाओं को ‘मानवीय झेल’ से बाहर निकालकर उन्हें प्रदेश निर्माण में भागीदार बनाना।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ की जनता मुख्यमंत्री में एक ऐसे नेतृत्व को देख रही है जो ब्यूरोक्रेसी के चश्मे के बजाय सीधे जनता की आँखों से समस्याओं को देखे। यदि नीति निर्धारण में मानवीय पक्ष और जन-संवेदना को प्राथमिकता दी गई, तो आगामी चुनौतियां अवसर में बदल जाएंगी और सरकार की लोकप्रियता में ‘बहुसंख्यक’ वोटों का इजाफा निश्चित है।
– . चंद्रशेखर तिवारी (परिकल्पना)

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