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तय समय सीमा में मुआवजा देने निर्देश

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0 वेदांता-बालको के खिलाफ रहवासियों को बड़ी राहत
बिलासपुर* छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कोरबा बालको के शांति नगर निवासियों के अधिकारों को संरक्षण देते हुए एक राहत भरा फैसला सुनाया है* न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ ने वेदांता समूह की कंपनी ‘बालको’ को कड़े निर्देश दिए हैं कि वह प्रभावितों की मुआवजा प्रक्रिया को तय समय सीमा के भीतर पूर्ण करे*
यह पूरा प्रकरण बालको द्वारा स्थापित 1200 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट से जुड़ा है* प्लांट के कूलिंग टावर से निकलने वाले भीषण प्रदूषण और शोर के कारण शांति नगर (बालको नगर) के निवासियों का जीवन दूभर हो गया था। इसी समस्या के समाधान, उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर वंदना सोनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी*याचिकाकर्ता का तर्क था कि पूर्व में दायर डिलेन्द्र यादव, आर नारायण द्वारा दायर एक जनहित याचिका के बाद बालको प्रबंधन ने भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास का आश्वासन दिया था* संशोधित सर्वे सूची में याचिकाकर्ता का नाम शामिल होने के बावजूद, उन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास का लाभ दिया गया*
कोर्ट में बालको की दलील और आदेश
सुनवाई के दौरान बालको प्रबंधन ने न्यायालय के समक्ष स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता का नाम प्रभावितों की सूची में शामिल है*कंपनी की ओर से कहा गया कि मुआवजे के आकलन और भुगतान की प्रक्रिया को जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। राज्य शासन ने भी इस तथ्य की पुष्टि की*
तर्कों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने मामले का निपटारा करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए:-याचिकाकर्ता के लिए: उन्हें 15 दिनों के भीतर अपना प्रतिवेदन (आवेदन) बालको प्रबंधन (प्रतिवादी क्रमांक 6) के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।बालको के लिएः प्रतिवेदन प्राप्त होने की तारीख से 90 दिनों के भीतर बालको को मुआवजे का आकलन कर उस पर अंतिम  निर्णय लेना होगा और भुगतान प्रक्रिया पूरी करनी होगी*
अब आश्वासन नहीं, कानूनी अधिकार
हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शांति नगर के उन सभी परिवारों के लिए एक मजबूत कानूनी नजीर बन गया है, जो वर्षों से प्रदूषण का दंश झेल रहे हैं* अब मुआवजा और पुनर्वास कंपनी की मर्जी या आश्वासन पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह उनका एक अनिवार्य कानूनी दायित्व बन गया है* न्यायालय ने इस प्रकरण में किसी भी पक्ष पर कोई अतिरिक्त लागत नहीं लगाई है। इस निर्णय से क्षेत्र के निवासियों में न्याय के प्रति विश्वास और गहरा हुआ है*

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सचिव स्कूल शिक्षा  6 सप्ताह में बनाएंगे नई नीति 
0 शिक्षा के अधिकार मामले में सुनवाई
0 शासन के जवाब से हाईकोर्ट हुआ नाराज
बिलासपुर * शिक्षा के अधिकार मामले में जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सचिव स्कूल शिक्षा को निर्देश दिया है कि, 6 सप्ताह में प्री स्कूल से संबंधित नई नीति बनाकर अदालत में पेश करें * अगली सुनवाई दिसंबर माह में निर्धारित की गई है *
“ शिक्षा का अधिकार” मामले में दायर जनहित याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में पहले हुई सुनवाई के दौरान शिक्षा सचिव की अनुपस्थिति पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट चेतावनी दी थी कि. ‘हाईकोर्ट को मजाक में न लें।* चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने सख्त लहजे में कहा था कि अगली सुनवाई में सचिव स्वयं उपस्थित होकर शपथपत्र के जरिए बताएं कि, गड़बड़ी करने वालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है* योजना के पात्र हितग्राहियों की आखिर अनदेखी क्यों हो रही है* नियम शर्तों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है *
   पहले से ही सोचना चाहिए
आज चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र अग्रवाल की स्पेशल डीबी में सुनवाई के दौरान शासन की ओर से कहा गया कि, शुरुआत से ही प्री स्कूल को मान्यता नहीं है * प्री प्रायमरी सारे निजी स्कूल बिना किसी मान्यता के ही चल रहे हैं कोई नियम नहीं बना है * याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता भगवंत राव के अधिवक्ता देवर्षि सिंह ने इसका विरोध करते हुए बताया कि , 2013 से नया नियम बना हुआ है, इसे लागू नहीं किया जा रहा है* इस पर राज्य के अधिवक्ता ने कहा कि, हम इस पर एक नया ड्राफ्ट तैयार कर रहे हैं जो जल्द ही लागू हो जायेगा * इस बात पर चीफ जस्टिस ने नाराजगी जताते हुए कहा कि , आपको कितना समय लग रहा है * इन सब बातों पर शिक्षा विभाग को पहले से ही सोचना चाहिए * कोर्ट ने स्कूल शिक्षा सचिव को आने वाले 6 सप्ताह में प्री स्कूल को लेते हुए नई नीति बनाने का निर्देश दिया है *
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिला दिलाया
गौरतलब है कि, गत माह हुई सुनवाई में कोर्ट ने राज्य शासन से यह भी पूछा था कि,गरीब बच्चों का हक मारकर आर्थिक रूप से सक्षम घरों के बच्चों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिला दिलाया गया* ऐसी गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ अब तक क्या कदम उठाए गए हैं* भिलाई निवासी राव की याचिका में आरोप लगाया गया है कि, फर्जीवाड़े के जरिए आरटीई के तहत गरीब बच्चों की सीटें कब्जाई जा रही है और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के बच्चों को दाखिला दिया गया है* निजी स्कूल भी आरटीई की सीटों को लेकर गंभीर नहीं है*

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