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जेल में बंद उजबेकिस्तान की दो महिलाएं होंगी डिपोर्ट


0 हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निराकृत
बिलासपुर* छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उज्बेकिस्तान की दो महिला नागरिकों की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण करते हुए कहा है कि, चूंकि केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही उन्हें उनके देश वापस भेजने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए मामले में आगे किसी न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रह गई है*
याचिकाकर्ता फेरूजा साबिरोवा और दिनोरा सफ्युत्दीनोवा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि,उन्हें जनवरी 2026 से रायपुर पुलिस द्वारा हिरासत में रखा गया है और बाद में रायपुर केंद्रीय जेल स्थित डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया* उन्होंने अदालत से अपनी हिरासत की वैधता की जांच कराने और शीघ्र रिहा कर उज्बेकिस्तान भेजने का अनुरोध किया था* चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि, वे भारत अपने रिश्तेदारों से मिलने और पर्यटन के उद्देश्य से आई थीं* उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है* एक महिला का पासपोर्ट और वीजा गुम हो गया था, जबकि दूसरी महिला का पासपोर्ट वैध है, लेकिन उसका वीजा समाप्त हो चुका है* उनके परिवारजन उज्बेकिस्तान में वापसी का इंतजार कर रहे हैं और वहां का दूतावास भी प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पूरी करने को तैयार है*  वहीं राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि, दोनों महिलाएं भारत में निर्धारित अवधि से अधिक समय तक अवैध रूप से रह रही थीं* उनके खिलाफ इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत अपराध दर्ज किया गया* 26 अप्रैल 2026 को उनकी गिरफ्तारी के बाद परिवार और उज्बेकिस्तान दूतावास को इसकी सूचना दी गई थी* उन्हें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रायपुर के समक्ष पेश किया गया, जहां से न्यायिक रिमांड पर केंद्रीय जेल भेजा गया*
प्रक्रिया अंतिम चरण में
सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि, दोनों महिलाओं को शीघ्र ही उज्बेकिस्तान भेजने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है* उज्बेकिस्तान दूतावास ने भी 25 मई 2026 को भेजे गए पत्र में उनके तत्काल प्रत्यावर्तन का अनुरोध करते हुए आवश्यक दस्तावेज और सहयोग उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है* इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि, जब संबंधित एजेंसियां स्वयं महिलाओं को उनके देश भेजने की कार्रवाई कर रही हैं, तब याचिका में विचारणीय कोई मुद्दा शेष नहीं रह जाता, इसी आधार पर अदालत ने याचिका का निराकरण कर दिया*

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